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बस्तर के दशहरा उत्सव के सोर अब सात संमुदर पार तको

बस्तर लोकोत्सव 30 सितंबर ले 12 अक्टूबर तक 

अंजोर ए.जगदलपुर। बस्तर के दशहरा परब आदिवासी संस्कृति अउ परंपरा के सेती देश दुनिया म अपन अलगेच पहचान बनाये हाबे। इहां के दशहरा ल देखे खातिर आन राज के अलावा विदेश ले तको पर्यटक मन बस्तर आथे अउ दंतेश्वरी माई के आसिक पाथे। 75 दिन तक ले चलइया ये परब ह हरेली ले सुरू होथे। जेन म बस्तरिहा मन अपन पंरपरा के अनुरूप उत्सव के जोखा करथे। जेन म प्रमुख रूप ले-
काछनगादी
बस्तर दशहरा के शुरूआत काछनगादी ले होथे। ये दिन माई के भगत मन धूमधाम ले काछन गुड़ी म सकलाथे दंतेश्वरी माई के पुजारी के अगवई म। कुंवारी के कन्या उपर देवी आए के बाद ओला कांटा के झुलना म बइठा के झुलाये जाथे। सबो भगत मन माता के पूजा करके बस्तर दशहरा मनाये के आदेश पाथे अउ तियारी म लग जाथे। 
जोगी बिठाई
दशहरा परब ह बिगर कोनो बाधा बिघ्न के उरक जाये इही कामना लेके जोगी बिठाई के रस्म करे जाथे। ये दिन अंचल के हल्बा समाज के एक आदमी ल सीरासार के गड्डा म बिठाये जाथे जेन ह नौ दिन तक योगसाधना म बइठे सिरिफ फलाहार करथे। तइहा समें ले इहां बकरा के बलि के रिवाज हावय फेर अब मांगुर मछली ल ही कांटे जाथे।
रथ परिक्रमा
जोगी बिठाई के दूसइया दिन ले रथ चले के सुरू हो जथे। फूल पान अउ तोरण-पताका ले सजे 12 चक्का वाले रथ म दंतेश्वरी माई के छत्र सवार होथे। रथ म सवार माई के छत्र ह नगर के कुछ मार्ग के परिक्रमा करके फेर सिंहद्वार म आके खड़ा होथे। ये मउका म गांव-गांव ले आये देवी-देवता मनके छत्र अउ बस्तर के लोक संस्कृति के अद्भूत रंग देखे ल मिलथे। 
जोगी उठाई, मावली परघाव
नवमीं के दिन सिरासार म बइठे जोगी ल उठाये के रिवाज होथे। मान सम्मान के संग वो युवक ल भेंट तको दे जाथे। इही दिन दंतेवाड़ा ले आये माई के डोला म मावली माता के सुवागत करे जाथे। मावली माता ल दंतेश्वरी माई के रूप माने जाथे। मावली माता ह दशहरा परब म शामिल होय खातिर डोला म सवार होके जगदलपुर आथे। 
भीतर रैना
दशमी के दिन भीतर रैना के कार्यक्रम संपन्न होथे। विजयादशमी के दिन रथ कना भइसासुर के प्रतिक भइसा बलि के प्रथा रिहिसे। इही दिन रातकुन पंरपरा के अनुसार रथ ल चोरा के आदिवासी मन कुमढ़ाकोट लेगथे। 
बाहर रैना
एकादशी के दिन बाहिर रैना के कार्यक्रम होथे। कुमढ़ाकोट म राजपरिवार के सदस्य, पुजारी, आन-आन गांव के मांझी, मुखिया मन अपन देवी-देवता के छत्र के संग देवी के पूजा करथे अउ अन्न चढ़ाके परसाद पाथे। फूल माला, नवा कपड़़़ा अउ झालर ले सजे रथ परिक्रमा करत फेर दंतेश्वरी मंदिर पहुंचथे।
मुरिया दरबार 
बाहिर रैना के बिहान दिन मुरिया दरबार के आयोजन होथे। दशहरा उरके के खुशी के संग काछिन देवी ल काछन गुड़ी ठउर म फेर अमराके बस्तरिहा मनके दरबार लगथे। जिहां आन-आन गांव ले आये मुखिया मन आपस म गोठबात करथे। मुरिया दरबार के संगे गांव-गांव ले आए देवी-देवता मनके विदाई हो जथे। 
ओहाड़ी
तेरस के दिन बिहनिया मावली माता के पूजा मंडप म माता के दंतेवाड़ा के बिदाई म जात्रा होथे। इही बिदाई कार्यक्रम ल ओहाड़ी कहे जाथे अउ ओहाड़ी उरके के बाद बस्तर दशहरा तको सिराथे। 

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